मेरा गाँव ✍️ Mishikwrites
सुबह से शाम मेरे गाँव में कुछ इस तरह गुज़रती थी, पापा की डांट से शुरू होकर माँ की लोरी पर रूकती थी, उलझे दोस्तों के संग हर मसले चाय पर सुलझते थे... मसले तो अब भी है इस शहर में, बस न उलझे हुए दोस्त है और नाही वह गाँव है| ~ Mishika #mishikawrites