" चाहत" - ' नशा या सज़ा ' ✍️ लेखिका : अवनी शिवांग दवे (शीवे स्वरी), वडोदरा. (१८/०६/२०२०)
:::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::
जानें क्या नशा हैं इश्क़ की चाहते में ?
अब तो हरपल जादू सा लगता है आहट में।
जलता हैं चाहत में जिस्म का खून ।
जब बनता हैं वह एक जुनून।
करती हैं चाहत हर किसीको गुमराह ।
जैसे जन्नत लगे सारा जहां ।
चाहत में आती हैं आशिकों को मजा।
लेकिन कभी कभी,
यही चाहत बन जाती हैं।
"मौत की सज़ा "!
लेखिका : अवनी शिवांग दवे (शीवे स्वरी), वडोदरा.
(१८/०६/२०२०)

Comments
Post a Comment