शीर्षक :- एक घर ✍️ भावना भट्ट , भावनगर , गुजरात / १८ जुलाई 2020
अभी तक है मुझमें
खिड़की, बरामदा और वह शाही झूला.
बरामदे में फैली धूप और हरसिंगार की खुश्बू.
तुलसी की क्यारी में जलता दीपक
जैसे माँ की ही मौजूदगी.
भीगे हुए मोगरे के फूल और वह चांदनी का रूतबा.
इक दिन खिड़की से घर तक चली आई
बेली ने बहुत ही नजाकत से पकड ली थी नागरबेली की कलाई और
वह बर्बस वहीं दहलीज पर ही रुक गई.
और आज तुमने कह दिया कि
वक्त ने तहस नहस कर दिया है सबकुछ
हमारे स्वप्नों की छाती पर खड़ी हो चुकी है
अब दोमंजिला इमारत
मगर कैसे मान लूँ मैं कि अब वहाँ कुछ भी नहीं ..!
मैं तो आज भी महसूस करती हूँ
वहाँ अपने अहसासों के घने जंगल को,
इच्छाओं के झुरमुट से झांकती
इक बुलबुल रोज गाती है
प्यार भरे गीत
एक घू घू भी आता है, गाता है, दिनभर बतियाता है बुलबुल से!
एक गिलहरी
आंगन से दौड़कर खो जाती है
नीम की पत्तियों में
जैसे कोई मस्तीखोर बच्चा माँ के आंचल में
घर की मुंडेर पर बैठा पपीहा और कोयल की जुगलबंदी
रस घोलती है कानों में
झूले का झूलना,चाय की चुस्कियां,किताबें,पेन कागज और तुम..!
कैसे मान लूँ कि अब वहाँ कुछ भी नहीं ?
पूरा का पूरा घर
अपने सभी ख्वाबों समेत जिंदा है
मुझमें
जैसे जिंदा होता है वृक्ष बीजों में
फूल कलियों में,गान साजों में, पत्ते डालियों में
और सागर बूंदों में..!
बस तनिक बैठो, छू लो मेरे मन को और पा लो अपने ही घर को..!
हमारा घर अब हमारी यादों का कहकशाँ
भावना भट्ट
भावनगर गुजरात
01 जुलाई 2020
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